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रुद्राक्षधारण का माहात्म्य
१. सभी आश्रमों और वर्णों के लोगों के लिए रुद्राक्ष धारण करने का शास्त्रोक्त विधान है, किन्तु द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) को मन्त्र का उच्चारण करके ही रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, किन्तु शूद्र को मन्त्र का उच्चारण नहीं करना चाहिए।
२. जो लोग रुद्राक्ष धारण करने में लज्जा एवं अपमान का अनुभव करते हैं, ऐसे मनुष्य करोड़ों जन्मों तक संसार से मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते।
३. रुद्राक्ष धारण करने से रुद्र रुद्रत्व को प्राप्त हुए, मुनिगण सत्यसंकल्प वाले हुए और चतुर्मुख ब्रह्माजी ब्रह्मत्व को प्राप्त हुए। इसलिए इस संसार में रुद्राक्ष धारण करने के अतिरिक्त कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है।
४. जो मनुष्य इस पृथ्वीलोक में रुद्राक्ष धारण करके शिवजी का ध्यान करते हुए अन्न का दान ब्राह्मण को करता है, वह अपने द्वारा किए गए सभी पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है।
५. जो व्यक्ति प्रसन्नचित्त होकर रुद्राक्षण धारण करनेवाले ब्राह्मण को श्राद्धकर्म में भोजन करवाता है, वह निःसन्देह पितृलोक को प्राप्त करता है।
६. जो मनुष्य जहाँ कहीं भी मन्त्र से अथवा बिना मन्त्र के या भाव से मुक्त होकर या लज्जा के वशीभूत होकर भक्तिभाव से केवल रुद्राक्ष धारण करता है, वह पृथ्वीलोक में अपने द्वारा किये गए सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर समस्त ज्ञान की प्राप्ति कर लेता है।
७. जिस व्यक्ति ने रुद्राक्ष धारण किया हो, ऐसे उत्तम व्यक्ति को देखकर जो उसकी निन्दा या अपमान करता है, ऐसे व्यक्ति के उत्पन्न होने में वर्णसंकरता का दोष निश्चित रूप से विद्यमान होता है, ऐसा शास्त्रों का वचन है।
८. रुद्राक्ष धारण करनेवाला व्यक्ति साक्षात् रुद्र स्वरूप हो जाता है। इसमें संदेह की आवश्यकता नहीं है। निषिद्ध चीजों को देखने, उनके विषय में सुनने, उनका स्मरण करने, उन्हें सूँघने, खाने, सदैव उनके विषय में वार्ता करने, सदैव ऐसा कर्म करनेवाले मनुष्य रुद्राक्ष धारण कर लेने मात्र से ही सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे मनुष्यों ने जो कुछ ग्रहण कर लिया, उसे मानो साक्षात् शिवजी ने अंगीकार कर लिया। उन्होंने जो भी किया है, सबकुछ भगवान् शिव ने ही ग्रहण किया है।
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