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लिंग की उत्पत्ति
एक बार भगवान् श्रीविष्णु और चतुर्मुख ब्रह्मा ने इस विषय पर कि परमेश्वर कौन है ? इस विषय को लेकर विवाद चल पड़ा। दोनों ही अलग-अलग तथ्यों से अपने आपको ईश्वर सिद्ध कर रहे थे। जब इन दोनों में परस्पर कलह हो रही थी उसी समय एक अति प्रकाशमान् ज्योतिर्लिंग
कलह निवृत्ति का साधन समझ कर यह निश्चय किया कि हम दोनों में से जो कोई इस लिग के अन्तिम भाग को स्पर्श करेगा, वही परमेश्वर कहलायेगा।
वह लिग नीचे और ऊपर दोनों ओर था। स्वयं ब्रह्माजी हंस बनकर लिंग का अग्रभाग ढूंढ़ने को ऊपर उड़े। उसी क्षण भगवान् विष्णु ने अति विशाल व सुदृढ़ वराह बनकर लिंग के नीचे की ओर प्रवेश किया। इस प्रकार ये दोनों हजारों वर्ष तक चलते रहे, किन्तु लिंग का अन्त न पा सके। तब ये दोनों अति व्याकुल होकर लौट आए और बार-बार उस परमेश्वर को प्रणाम कर उसकी माया से मोहित होकर सोचने लगे कि यह क्या है? कि जिसका कहीं न आदि है न अन्त है। जब ये दोनों आपस में विचार कर रहे थे तो एक ओर से प्लुत स्वर से 'ओ३म् ओ३म्' यह शब्द सुनाई पड़ा। शब्द का अनुसन्धान करके लिंग की दक्षिण की ओर देखा तो 'ॐकार' स्वरूप स्वयं साक्षात् शिव दीख पड़े, तब देवादिदेव भगवान् विष्णु ने उनकी स्तुति की। स्तुति को सुनकर शिवजी प्रसन्न होकर कहने लगे- तुम हमसे भयभीत न होकर हमारा दर्शन करो। क्योंकि तुम दोनों ही हमारे शरीर से उत्पन्न हुए हो। सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा मेरे दक्षिण अंग से और भगवान् विष्णु वाम अंग से उत्पन्न हुए हैं। अतः तुम दोनों से प्रसन्न हूँ, अपनी इच्छानुसार वर माँगो। तब भगवान् विष्णु और ब्रह्माजी ने शिवजी के चरणों में दृढ़भक्ति माँगी। यदि शिवजी के विषय में यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी-
नास्ति सर्वसमो देवो नास्ति सर्वसम गतिः। नास्ति सर्वसमो दाने नास्ति सर्वसमो रणे ॥ न तो ऐसा कोई देवता है, न ही ऐसी कोई गति है। न ऐसा कोई दानी
है और न ही ऐसा कोई योद्धा है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग - शिवपुराण के अनुसार-सम्पूर्ण प्राणियों के कल्याण के लिए शिवजी लिंग रूप से विविध तीर्थों में निवास करते हैं। भक्तों की उपासना से प्रसन्न होकर ये उन्हीं उन्हीं स्थानों में आविर्भूत हुए और ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए विद्यमान हो गए। वैसे तो इस धरातल पर वर्तमान समय में शिवलिगों की संख्या की गणना करना असम्भव है। फिर भी इन सभी लिगों में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की प्रधानता है।
जिनके नाम इस प्रकार से हैं- सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारेश्वर, भीमशंकर, विश्वेश्वर, त्र्यम्बक, वैद्यनाथ, नागेश, रामेश्वर और घुश्मेश्वर ये शिव के विश्वप्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंग हैं। यथा-
सौराष्ट्र सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारे परमेश्वरम् ॥
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम् ।
वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ॥
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने । सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये ॥
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
सर्वपापैर्विनिमुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत् ॥
(शिवपुराण ज्ञा० सं० अ० ३८)
उपरोक्त श्लोकों का जो भक्त प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसके सात जन्मों के किए हुए पाप विनष्ट हो जाते हैं।
निर्गुण-निराकार-रूप में लिंगोपासना- शिवलिंग के पूजन की विशेष महिमा बताई गई है। पूजन के पहले नवनिर्मित शिवलिंग की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। बाणलिंग और नर्मदेश्वर लिग शालग्राम शिला की तरह स्वप्रतिष्ठित माने जाते हैं। इसलिए इनकी प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है। इनके अतिरिक्त मन्दिर आदि स्थानों में पूर्वप्रतिष्ठित लिग, स्वयम्भू-लिंग और ज्योतिर्लिंग आदिदेवों की पूजा में आवाहन और विसर्जन की आवश्यकता नहीं होती है। किन्तु विशेष रूप से पार्थिव लिंग के पूजन में प्रतिष्ठा और आवाहन-विसर्जन अति आवश्यक होता है।
By Pandit Nitesh Kumar Thakur
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