रुद्राभिषेक व रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन

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रुद्राभिषेक व रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन

काश्मीर देश में भद्रसेन राजा का पुत्र सुधर्मा व उसके मन्त्री का पुत्र तारक दोनों ही महान् शिवभक्त एवं पितृभक्त थे। दोनों ही प्रतिदिन अपने पूरे अंगों में भस्म धारण कर रुद्राक्ष की माला पहनकर नित्य शिवपूजन व आराधना में लगे रहते थे।

एक समय महामुनि पराशर जी राजा के यहाँ आए। उनसे राजा को यह ज्ञात हुआ कि सुधर्मा की आज से सातवें दिन अकाल मृत्यु होनेवाली है। इस बात को सुनकर राजा को अत्यधिक शोक हुआ। जब राजा ने महामुनि पराशर जी से इस होनेवाली अकालमृत्यु को विफल करने का उपाय पूछा तो पराशर जी ने कहा- हे राजन्। यदि रुद्राष्टाध्यायी की दस हजार आवृत्तियों के द्वारा देवाधिदेव परमपिता परमेश्वर अर्थात् शिवजी का जलाभिषेक किया जाए तो तुम्हारे पुत्र की अपमृत्यु भी टल सकती है। तब मुनि के वचन से राजा को कुछ शान्ति मिली। राजा ने अनेक पारंगत विद्वान् ब्राह्मणों को आमंत्रित कर संकल्प कर रुद्राभिषेक प्रारम्भ करवा दिया। सातवें दिन मध्याह्न के समय सुधर्मा की मृत्यु हो गई। तब मुनि पराशर ने रुद्राभिषेक के पवित्र एवं अभिमन्त्रित जल से सुधर्मा के मृत शरीर को अभिषिक्त किया तथा पवित्र मन्त्रीकृत रुद्राक्ष के द्वारा कुछ जल की बूंदें उसके मुख में डाली।

भगवान् शिव की कृपा से सुधर्मा के प्राण वापस लौट आए। जब सुधर्मा से पूछा गया तो उसने बताया कि मुझे यमराज ले जा रहे थे। इतने में ही अचानक एक तेज से युक्त सफेद काया जटाजूटधारी मूर्त ने प्रकट होकर यमराज को डाँटते हुए मुझे उनके बन्धन से मुक्त करा दिया। यमराज मुझे छोड़कर स्वयं उनकी स्तुति करने लगे।

सुधर्मा को नया जीवन प्राप्त होने पर सम्पूर्ण राजपरिवार में आनन्द व्याप्त हो गया। सभी लोग शिवभक्ति में अब और भी संलग्न हो गए। राजा का पुत्र सुधर्मा और मन्त्री का पुत्र तारक ने शिवभक्ति की महिमा का कथा-कीर्तन, अभिषेक आदि के द्वारा सभी जगह प्रचार-प्रसार कराया।

विशेष श्रावण मास में भगवान् शिव का रुद्राभिषेक इसलिए कराया जाता है कि उन्होंने समुद्र मन्धन से निकले हुए कालकूट नामक विष को अपने गले में धारण किया था। उनके गरल को शान्ति के लिए श्रावण मास में अभिषेक होता है। वैसे तो भगवान् शिव की प्रसन्नता के लिए उनका अभिषेक किसी भी समय कराया जा सकता है।

 

By Pandit Nitesh Kumar Thakur

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